"वक़्फ़ बिल—अमानत में दख़ल" || बरसों से कब्ज़ा जमाए बैठे लोगों में बेचैनी!! इस्लामी उसूलों के मुताबिक इस्तेमाल हो
लोकसभा में आज जिस तरह वक़्फ़ बिल पर सियासी जंग छिड़ी, उसने पूरे मुल्क ही नहीं, दुनिया भर में तअज्जुब पैदा कर दिया। यह कोई नया मसला नहीं है, बल्कि बरसों से उठता रहा है, लेकिन इस बार इसकी गूँज कुछ ज़्यादा ही तेज़ सुनाई दी।
बात बुनियादी है— वक़्फ़ की मिल्कियत कोई आम जायदाद नहीं होती। यह एक अमानत है, जो ख़ुदा की राह में वक़्फ़ की जाती है, ताकि इसके फ़ायदे से ग़रीबों, यतीमों, बेवाओं और समाज के ज़रूरतमंद तबक़ों की मदद हो सके। मस्जिद, दरगाह, मदरसे, मुसाफ़िरख़ाने—यह सब इसी अमानत का हिस्सा हैं। लेकिन अफ़सोस, सालों से इस अमानत में दख़लअंदाज़ी हो रही है, और यह सिर्फ़ हुकूमत की नहीं, बल्कि वक़्फ़ बोर्ड और मुतवल्लियों की भी नाकामी है।
वक़्फ़ बोर्ड, चाहे सुन्नी हो या शिया, ने अक्सर ऐसे मुतवल्ली तैनात किए जिन्होंने अमानत को तिजारत बना दिया। वक़्फ़ की ज़मीनें बेचीं गईं, ऊँचे किराए पर उठाई गईं, और यह दौलत ग़रीबों तक पहुँचने के बजाय ख़ास लोगों की जेब में चली गई। इतना ही नहीं, कई जगहों पर वक़्फ़ बोर्ड का अमला भी इस बंदरबाँट में शरीक़ रहा।
मुस्लिम समाज यह सब देखता रहा, महसूस करता रहा, मगर कुछ कर न सका। लेकिन जब मौजूदा हुकूमत की नज़र इस मसले पर गई और करोड़ों-अरबों की वक़्फ़ मिल्कियत और उसकी आमदनी का हिसाब-किताब सामने आया, तो सख़्त क़ानून लाने की तैयारी शुरू हो गई। ज़ाहिर है, इससे उन लोगों में बेचैनी फैल गई जो बरसों से इन जायदादों पर क़ब्ज़ा जमाए बैठे थे।
इसमें कोई शक नहीं कि कुछ हलक़ों में यह तहरीक इसलिए भी है कि वक़्फ़ को सरकारी कंट्रोल में लाने की कोशिशें हो रही हैं। मगर असल सवाल यह है कि क्या वक़्फ़ की अमानत महफ़ूज़ है? क्या इसका सही इस्तेमाल हो रहा है? हुकूमत के इस क़दम से कुछ लोग नाराज़ हैं, मगर कई मुसलमान इस पर ख़ुश भी हैं, क्योंकि यह क़दम वक़्फ़ की हिफ़ाज़त और ग़रीबों के हक़ को बहाल करने की एक उम्मीद जगाता है।
मेरी अपील है कि वक़्फ़ की आमदनी का इस्तेमाल सिर्फ़ इस्लामी उसूलों के मुताबिक़ हो। मस्जिद, दरगाह, इबादतगाह और दीनी तालीम की जगहों को हर हाल में महफ़ूज़ रखा जाए। वक़्फ़, सियासत का मैदान नहीं, बल्कि एक ख़ुदाई अमानत है और इसे उसी तरह बरक़रार रखना हर ज़िम्मेदार शख़्स की फ़र्ज़ है।
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(लेखक डॉ. सिराज क़ुरैशी, भारत सरकार द्वारा कबीर पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं और फ़तेहपुर सीकरी वक़्फ़ कमेटी के पूर्व अध्यक्ष हैं। लेख में प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)
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