बौद्धिक चिंतन: क्या है जीव और क्या है "आत्मा"
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"आत्मा" के बारे में धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं को आपने खूब पढ़ा होगा। पुरातन मनीषियों और विद्वानों ने आत्मा को परमात्मा का अंश बताते हुए अनेक प्रकार से व्याख्या की है। मान्यता है कि आत्मा सूक्ष्म रूप में हमारे शरीर में विद्यमान रहती है और शरीर को क्रियाशील बनाए रखती है। आजकल हमारी नई पीढ़ी अनेक मामलों को धार्मिक तथ्यों के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और व्याख्याओं के आधार पर जल्दी समझती है। इसे ध्यान में रखकर चिंतक और विचारक जे एस फौजदार ने अपने तरीके से समझाने की कोशिश की है कि ''आत्मा क्या है और कैसे क्रियाशील रहती है।"
पूर्व में शिक्षक रह चुके शहर के प्रमुख समाजसेवी जे एस फौजदार यूं तो लंबे समय से कालोनाइजिंग व्यवसाय से जुड़े हुए हैं, लेकिन समय-समय पर वे बौद्धिक चिंतन और मंथन भी करते रहते हैं। वे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक मामलों में अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए पहचाने जाते हैं। "न्यूज नजरिया" पूर्व में भी उनके नजरिये को अपने पाठकों के समक्ष रखता रहा है। इस बार प्रस्तुत है उनका आलेख - "आत्मा"
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धार्मिक परम्पराओं व मान्यताओं के अनुसार" आत्मा" ही जीव को संचालित व ऊर्जित करने का आधार है। इस कथन को समझने के लिए हमें "आत्मा" "जीव" "संचालित" व "ऊर्जित" प्रक्रिया को समझना आवश्यक है।
"जीव" की कल्पना तभी संभव है जब उसका कोई भौतिक आयाम होगा यानि अस्तित्व तभी संभव है जब इसमें "पदार्थ" और "द्रव्यमान" हो और यह जड़त्व की विशेषता पृथ्वी तत्व है।
इसके साथ-साथ उस वस्तु में गतिशीलता भी होनी चाहिए जो हमें "वायु तत्व" से मिलती है। वायु तत्व की विशेषता है "वेग।"
किसी वस्तु में गति तभी संभव है जब उसके ऊपर कोई बल लगाया जायेगा और जब बल लगेगा तो समान और विपरीत प्रतिक्रिया भी होगी। इस प्रकार ये दोनों बल एक दूसरे को नष्ट करने की कोशिश करेंगे इससे बचने के लिए जिस प्रकार फुटबाल मैच में जब दो विरोधी खिलाड़ी आमने-सामने होते हैं तो सीधे न टकराकर इधर-उधर से बचते हुए एक तरंग की तरह गति करते हुए आगे निकल जाते हैं और यही तरलता का गुण हमें "जल तत्व" से मिलता है जो हमें विपरीत परिस्थितियों में भी अग्रसर करता है।
पृथ्वी तत्व, वायु तत्व व जल तत्व के साथ-साथ इन ऊर्जाओं द्वारा कार्य करने से होने वाली ऊर्जा-क्षति की पूर्ति के लिए हमें उर्जित रखने के लिए अग्नि तत्व जिसका गुण तेज (तीव्रता) है, की भी आवश्यकता होती है जो हमें क्रियाशील बनाती है।
जीव के लिए आवश्यक ये चार तत्व हमें कब, कहाँ से व कितनी मात्रा में चाहिए इसके लिए हमारे अंदर "चेतना" का होना भी आवश्यक है जो हमें आकाश तत्व से मिलती है। आकाश तत्व के अंदर सभी प्रकार की आवश्यक ऊर्जा जैसे - ग्रीष्म ऊर्जा, विद्युत एवं चुंबकीय ऊर्जा व बहुत सारी गैसें हमें मिलती हैं। आकाश द्वारा प्राप्त ऊर्जा (चेतना) हमारी ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्द्रियों को भली-भांति संचालित रखती है।
उपरोक्त पांचों तत्वों या ऊर्जाओं के सम्मिश्रण से ही हर जीव की उत्पत्ति होती है। जीव के दो मुख्य चरण होते हैं, पहला- उत्पत्ति और दूसरा- पोषण द्वारा पूर्ण स्थिति को प्राप्त करते हुए क्रियाशील रहना। इन पांचों तत्वों में पृथ्वी व आकाश तत्व में उत्पत्ति कारक गुणों की अधिकता व जल, वायु व अग्नि में पोषक तत्वों की अधिकता रहती है।
क्रियाशील स्थिति में इन तत्वों का संतुलन में होना अति आवश्यक है। इसके लिए ये तत्व एक ऊर्जा से दूसरी ऊर्जा में परिवर्तित होते हुए संतुलन बनाये रखते हैं। इस संतुलन की क्रिया में आकाश तत्व से मिलने वाली चेतना जिसका माध्यम "ध्वनि" होता है हमारी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा हमें सचेत करती हैं। इन इन्द्रियों के द्वारा हम बाह्य ऊर्जा को स्वीकार करते हैं या फिर प्राप्त करते हैं। उसको पहचानते हैं और आवश्यकतानुसार कर्मेन्द्रियों को निर्देश देकर जीव को कार्य की परिस्थिति में रखते हैं।
अतः जिसमें पांचों तत्व क्रियाशील होंगे वही जीव होगा और जीव में किसी भी जीवित वस्तु को ग्रहण करना या प्राप्त करना, विवेचना करना तथा उसके अनुसार कार्य करना (functioning of accepting, receiving, recognition and working accordingly) ही "आत्मा" है।
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