अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा है रूस
नजरिया/आलेख- पूरन डावर
(चिंतक एवं विश्लेषक)
रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते हुए आज 81 दिन हो चुके हैं, मगर अभी तक यूक्रेन पर कब्जे की रूस की हसरत पूरी नहीं हो सकी है। युद्ध के कारण पर जब नजर डालते हैं तो स्पष्ट है कि रूस ने यूक्रेन की नाटो सदस्यता से सशंकित होकर उस पर सवाल करते हुए अकारण हमला बोल दिया। रूस को गुरुर था कि चंद दिनों में यूक्रेन पर कब्जा कर बाकी छोटे-छोटे देश कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान , लातविया, लिथुआनिया… आदि को स्पष्ट धमकी दे सकेगा। साथ ही एक बार फिर संप्रभुत्व देशों को मिलाकर फिर सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य बना लेगा और पूर्वी यूरोप पर फिर दबाव बनाने में कामयाब होगा लेकिन पुतिन की यह मंशा पूरी होती नहीं दिख रही।
नाटो की सदस्यता कभी किसी देश के लिए खतरा नहीं हो सकती, नाटो केवल सदस्य देशों को सुरक्षा प्रदान करता है। आज तक किसी नाटो देश ने स्वतः किसी भी देश पर आक्रमण नहीं किया। नाटो जैसे संगठन विश्व शांति के लिए आवश्यक हैं। आपसी सहयोग और सामूहिक सेना से अनावश्यक सेना पर खर्च बचता है और आक्रमण की स्थित में नाटो की संयुक्त सेना बचाव करती है। ऐसा संभवतः कोई उदाहरण हो जब नाटो देशों ने किसी पर आक्रमण किया हो। रूस की आशंका कतई बेमानी है, नाटो से रूस को किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं है। बल्कि नाटो की सदस्यता के बाद यूक्रेन भी अपने किसी पड़ोसी या कमजोर देश पर आक्रमण नहीं कर सकेगा। पुतिन पूर्व सोवियत देशों को आज भी अपने गुलाम के रूप में देखना चाहते हैं। सोवियत देशों की एकता के बीच रूस अपना प्रभुत्व छोटे देशों के साथ आपसी सहयोग से ही कर सकता है।
यूक्रेन में मानवता पर चोट और अपने ही लोगों को नष्ट करना रूस को महंगा पड़ने वाला है। रूस आज अपने ही विनाश की ओर बढ़ रहा है। जहाँ तक भारत की बात है, भारत की सैन्य शक्ति की निर्भरता अभी कुछ हद तक रूस पर है, भारत यद्यपि मानवीय दृष्टि से यूक्रेन के साथ है, लेकिन खुलकर मदद का जोखिम नहीं लेना चाहता। यद्यपि अब नए आधुनिक संयंत्र अमेरिका, फ्रांस, इज़रायल से आ रहे हैं। भारत स्वयं आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। अब सभी नये सैन्य आयात के साथ तकनीक पर भी समझौते हो रहे हैं ताकि आगे हथियार यहीं बन सकें, तभी राफेल की कीमत पर उंगली भी उठायी गयी।
रूस-भारत सम्बन्ध नेहरू काल से रहे हैं। भारत की मजबूरियां भी हो सकती हैं, लेकिन रूस ऐसा देश है जिसने भारत का पूरी तरह दोहन किया है। भारत के बैलेन्स ऑफ ट्रेड को बिगाड़ने में रूस का बड़ा हाथ है। जब डालर की कीमत आठ रुपये थी रूस 34 रुपये वसूलता था। बंद अर्थव्यवस्था के कारण यह अंधा खेल चल रहा था। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद एक अमेरिकी डालर में 4500 रूबल तक गिरा। इससे अनुमान लगाया जा सकता है, यदि सोवियत संघ का विघटन न हुआ होता तो भारत की अर्थव्यवस्था टूटने के कगार पर आ सकती थी।
अमेरिका पर वादाखिलाफी के आरोप लगे, लेकिन अमेरिका ने युद्ध को रोकने के यथा सम्भव प्रयास किये। अमेरिका चेतावनी दे सकता है सीधे युद्ध में कूदने का मतलब है विश्वयुद्ध। अमेरिका यूक्रेन की हर मदद कर रहा है। सारे प्रयास अमेरिका ने किये कि रूस युद्ध न करे लेकिन रूस ज़िद पर अड़ा रहा। आज स्थिति विनाश की है। पड़ोसी बाल्टिक देश अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। आज उन्हें भी नाटो की सदस्यता लेनी पड़ रही है। विश्व के सबसे सौम्य और शांतिपूर्ण बाल्टिक देश आज सहमे हुए हैं। विश्व युद्ध की सम्भावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। रूस का अपने अस्तित्व को बचाने के लिये बार-बार परमाणु बम की धमकी देना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। रूस के अस्तित्व के लिए यदि कोई ख़तरा है तो स्वयं पुतिन या रूस का नेतृत्व। (क्रमशः)
(यह लेखक के निजी विचार और सोच है। विचारधाराओं में भिन्नता समाज का एक भाग है)
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