सुभाष राय का नवीन कविता संग्रह "मूर्तियों के जंगल में"
लखनऊ। कवि, संपादक सुभाष राय का नवीन कविता संग्रह "मूर्तियों के जंगल में" प्रकाशित हुआ है। यह उनका दूसरा काव्य संग्रह है। इसके पूर्व उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। एक कविता संग्रह 'सलीब पर सच', एक निबंध संग्रह 'जाग मछन्दर जाग' और संस्मरण एवं आलोचनात्मक लेखों का एक संग्रह 'अंधेरे के पार।' उन्हें नयी धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान एवं देवेन्द्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
है। सुभाष राय की कविताएँ सकारात्मकता को प्रस्तावित करते हुए समाज की प्रतिगामी शक्तियों का विरोध करती हैं। इनकी कविताओं में वर्तमान जीवन गहरे धँसा हुआ है।...
जनवरी, 1957 में उत्तर प्रदेश के एक गांव बड़ागांव (मऊ) में जन्मे सुभाष राय ने गांव में प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई के बाद आगरा विश्वविद्यालय के साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा और साहित्य में स्रातकोत्तर की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। वहीं से विधि की पढ़ाई पूरी की और उत्तर भारत के विख्यात संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर डाक्टरेट पूरी की। उनके हिस्से आपातकालीन ज्यादतियों के खिलाफ आंदोलन और जेलयात्रा भी आयी। चार दशकों से भी ज्यादा समय से वे पत्रकारिता में सक्रिय हैं। कई प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्रों में शीर्ष जिम्मेदारियां संभालने के बाद इस समय लखनऊ में जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं।
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