योर ऑनर, बंदरों से निजात दिलाइये!

आगरा में बंदरों से छुटकारा पाने के लिए अधिवक्ता हाईकोर्ट की शरण में 
उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर नौ विपक्षियों को नोटिस जारी किए
आगरा, 24 जुलाई। वरिष्ठ अधिवक्ता के.सी. जैन जिले में बढ़ती बंदरों की समस्या से निजात पाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण में चले गए हैं। जैन का दावा है कि उच्च न्यायालय ने उनकी जनहित याचिका स्वीकार करते हुए राज्य सरकार व नगर निगम समेत नौ विपक्षियों को नोटिस जारी कर दिये हैं।
अधिवक्ता के अनुसार, न्यायमूर्ति प्रतींकर दिवाकर एवं न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की खण्डपीठ ने विगत 19 जुलाई को जनहित याचिका संख्या 1207 वर्ष 2022 का संज्ञान लेते हुए अपने आदेश में कहा, ”बंदरों के खतरे ने आगरा शहर को त्रस्त कर दिया है, जहां पर्यटकों और स्थानीय लोगों को बंदर समान रूप से परेशान करते पाए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निवासियों को गंभीर चोटें और कीमती सामान का नुकसान हो रहा है। कभी-कभी बंदरों के हमले के कारण युवा और वृद्धों की मौत हो गई। जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय के हस्तक्षेप से बन्दरों को दूर करना चाहते हैं क्योंकि विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि अधिकारीगण इस समस्या के समाधान में विफल रहे हैं।"
अधिवक्ता केसी जैन व समाजसेवी प्रशान्त जैन द्वारा प्रस्तुत इस याचिका पर अगली सुनवाई की तिथि 17 अगस्त नियत की गई है। जनहित याचिका में उल्लेख किया गया है कि शहर में 30,000 से अधिक बन्दर हैं। बन्दरों के आक्रमण से हजारों लोग घायल हो चुके हैं और अनेक व्यक्तियों की मृत्यु भी हो चुकी है। बन्दर आये दिन विश्वदाय स्मारक ताजमहल में भी यात्रियों पर हमला कर देते हैं। नगर निगम व वन विभाग बन्दरों की समस्या के समाधान के लिए कोई प्रभावी हल नहीं ढूँढ सके हैं। 
याचिका में मांग की गई है कि शहर के बन्दरों के लिए केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की अनुमति लेते हुए वन क्षेत्र में मंकी रेस्क्यू सेन्टर की स्थापना की जाये।  बन्दरों को सुरक्षित व वैज्ञानिक ढंग से समयबद्ध रूप में इनमें ले जाया जाये। इन रेस्क्यू सेन्टर के चारों ओर रोक भी हो।
याचिका में मांग की गयी है कि पर्यावरण व वन मंत्रालय द्वारा अपने आदेश 09 फरवरी, 2018 द्वारा जानवरों के कारण लोगों की हुयी मृत्यु अथवा लगी चोट के लिये धनराशि निर्धारित की गयी है। यह राशि मृत्यु होने की दशा में पांच लाख, गंभीर चोट होने पर दो लाख एवं मामूली चोट होने पर पच्चीस हजार रुपये है। लेकिन यह तय राशि पीड़ितों को दी नहीं जा रही है। याचिका में अदालत से इस बारे में भी आदेश जारी करने की मांग की गई है।


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