जूता कारोबारियों के जले पर नमक छिड़का

जीएसटी घटाने की पुरानी मांग मानी नहीं, फिनिश्ड लैदर पर बढ़ा दिया टैक्स
महँगे होते मेटेरियल और चीनी माल ने पहले ही तोड़ रखी है कमर
एक हजार जोड़ी रोजाना बनाने वाले बना रहे मात्र 250 जोड़ी जूते
आगरा, 30 जून। पहले से ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे जिले के जूता उद्योग के लिये जीएसटी में बढ़ोतरी जले पर नमक छिड़कने जैसा है। चंडीगढ़ में बुधवार को सम्पन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में फिनिश्ड चमड़े पर जीएसटी की दर पांच से बढ़ा कर 12 प्रतिशत करने का निर्णय ले लिया गया। 
देश मे 65 प्रतिशत जूतों की आपूर्ति करने वाले घरेलू उद्योग और निर्यात में 27 प्रतिशत की भागीदारी निभाने वाले निर्यातकों के लिये यह दोहरी मार है। घरेलू जूता उद्योग से जुड़े उद्यमी एक हजार रुपये से कम कीमत के जूतों से जीएसटी हटाने या फिर केवल पांच प्रतिशत रखे जाने की मांग को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं। 
टैक्स और महंगे होते मेटेरियल के कारण जूते की लागत पहले ही बढ़ी हुई है। लागत बढ़ने का सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है। हालात यह हैं कि जिस जूते की फैक्ट्री में प्रतिदिन एक हजार जूते की जोड़ी बनती थी, वह अब सिर्फ 200 से 250 तक ही सीमित रह गई है। ट्रेडर अब सिर्फ ऑर्डर उतना ही दे रहे हैं जितनी उनको जरूरत है। उत्पादन में गिरावट के कारण जूते के कारोबारियों और कारीगरों दोनों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जूते का कारोबार कम होने में जीएसटी की भी मुख्य भूमिका रही है। पहले जीएसटी जूते पर दामों के हिसाब से रखी गई थी, लेकिन जीएसटी को बढ़ा दिया गया। केंद्र सरकार से कोई राहत न मिलने से घरेलू जूता उद्योग घोर संकट के दौर से गुजर रहा है। जानकार मानते हैं कि यही हाल रहा तो इस उद्योग पर चीन का कब्जा हो जायेगा।
जूते के साथ सरकार का सौतेला व्यवहार-गागानी
आगरा शू फैक्टर्स फैडरेशन के अध्यक्ष गागन दास रामानी का कहना है कि वर्ष 2017 में जीएसटी लागू करते समय 1000 रुपये तक के वस्त्रों पर पांच प्रतिशत जबकि 500 रुपये तक के फुटवियर पर पांच प्रतिशत कर लागू किया गया था। उस समय एक हजार रुपये से अधिक मूल्य के वस्त्रों पर कर 12 प्रतिशत और 500 रुपये से अधिक मूल्य के फुटवियर पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया। जूता व्यापारियों व उद्यमियों के कई प्रतिवेदन और वार्तालाप के परिणामस्वरूप 1000 रुपये तक के फुटवियर पर पांच प्रतिशत जीएसटी कर दी गई। जीएसटी काउंसिल की सितंबर, 2021 की लखनऊ बैठक में फिर से टैक्सटाइल और फुटवियर पर कर की दर बढ़ाकर पांच से 12 प्रतिशत कर दी गई, सिर्फ टैक्सटाइल पर रोल बैक किया गया और फुटवियर से सौतेला व्यवहार किया गया। तमाम वायदों के बावजूद सरकार ने फुटवियर पर कर की दर पांच प्रतिशत नहीं की। 
गागानी ने कहा कि कच्चे माल, पैकिंग मेटेरियल व जूते, चप्पल रखने के लिए प्रयोग होने वाले बाक्स में लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से जूते की लागत बढ़ चुकी है। ऐसे में जीएसटी की मार फुटवियर कारोबार को रसातल में ले जाएगी। गागानी का कहना है कि कोविड के प्रभाव के बाद फुटवियर के लगभग 30 प्रतिशत कारखाने या तो बंद हो गए हैं या फिर उनका उत्पादन आधे से भी कम हो गया है। 

चीनी मेटेरियल ने बिगाड़ी जूते की चाल
जूते के मेटेरियल की दुकान करने वाले विमल कहते हैं कि पहले मेटेरियल देश में ही बनता था, जिसके कारण दाम कम होते थे और जूते भी सस्ते बनते थे, लेकिन चीन ने अलग डिजाइन का मेटेरियल बनाना शुरू कर दिया। अब दिल्ली में मेटेरियल चीन से आता है। इस कारण मेटेरियल के दामों में वृद्धि हुई और जूते के दाम फैक्ट्री स्वामियों ने बढ़ा दिए। इसका असर काम पर पड़ा है।
सोल विक्रेता कामरान ने बताया कि चीन द्वारा निरंतर नए-नए तरीके के सोल डिजाइन किए जा रहे हैं, जो लोगों को पसंद आते हैं। यही वजह रहती है कि हमें भी उसी तरह के सोल बनाने पड़ते हैं, लेकिन सोल के मेटेरियल के दाम बढ़ने से दिक्कत बढ़ गई है।

जूते के दाम बढ़ने से ऑर्डर मिलने हुए कम
इंडियन शूज कंपनी के मालिक मोहम्मद इमरान और फरमान ने बताया कि वे जूते की ट्रेडिंग का काम करते हैं, फैक्ट्रियों से बना हुआ जूता लेते हैं और उसको देश के अलग-अलग हिस्सों में सप्लाई करते हैं, लेकिन जिस तरह से जूते के दामों ने आसमान छुआ है, उसको लेकर बहुत ही कम ऑर्डर मिल रहे हैं। अब वे भी फैक्ट्री स्वामियों को सिर्फ उतना ही ऑर्डर देते हैं, जितनी आवश्यकता है।

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