आगरा में प्रत्याशियों के चयन पर कड़े फैसले ले सकती है भाजपा




आगरा।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में सत्तारूढ़ पार्टी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जिले की सभी नौ सीटों पर बढ़त बनाये रखने के लिए कुछ कड़े फैसले ले सकती है। कुछ वर्तमान विधायकों को पुनः टिकट न देने और उनके स्थान पर नये चेहरों को मौका देने पर संगठन में गम्भीरता से मनन चल रहा है।

विधानसभा चुनावों में कुल तीन सौ सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा के रणनीतिकार अपने सम्भावित प्रत्याशियों की जनस्वीकार्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। सूत्रों का दावा है कि जिले की नौ विधानसभा सीटों पर कुछ वर्तमान विधायक इस पैमाने पर खरे उतर रहे हैं, तो कुछ की नैया डांवाडोल है।

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में जिले की सभी सीटें जीतने के बाद भाजपा के कुछ विधायक तो निरन्तर जनता से जुड़े रहे और उनकी समस्याओं को हल कराने में प्रयासरत रहे, वहीं कुछ ने न केवल जनता से दूरी बना ली बल्कि व्यवहार भी रूखा कर लिया। पार्टी आलाकमान तक ऐसे जनप्रतिनिधियों की शिकायतें पहुंचती रहीं। पार्टी ने संगठन से जुड़े पदाधिकारियों से भी फीडबैक लिया। इस फीडबैक में भी चार से पांच विधायकों की रिपोर्ट सन्तोषजनक नहीं रही है। एक विधायक के निर्वाचन क्षेत्र में उनकी गुमशुदगी के पोस्टर तक लग चुके हैं। ऐसे हालात में भाजपा किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहती है।

पार्टी के रुख को भांपते हुए नये दावेदार भी बड़ी संख्या में अपनी दावेदारी करने लग गए हैं। इन दावेदारों ने दिल्ली और लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालयों की परिक्रमा भी शुरू कर दी है। अपनी दावेदारी के पक्ष में तमाम तर्क देने के साथ ही वर्तमान विधायकों की कमियां गिनाई जा रही हैं। दावेदारों का कहना है कि पार्टी को सीट बचाये रखने के लिए नए प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारना चाहिए।

राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में भाजपा का परम्परागत वोट बैंक है, जबकि ग्रामीण इलाकों में हमेशा से ही जातीय समीकरण हावी रहते आये हैं। भाजपा को टिकट वितरण में इन समीकरणों को भी पूरी तरह ध्यान में रखना होगा। पिछले चुनावों में जिले की कुछ सीटों पर मतों के कम अंतर से हुई हार-जीत इस बार विपक्षी दलों के लिए बेहतर मौका साबित हो सकती है।

भाजपा के समक्ष एक बड़ी चुनौती मतदाताओं की नाराजगी दूर करने की और उन्हें मतदान के लिये प्रेरित करने की है। जानकारों का कहना है कि यह सम्भव है कि पार्टी के लिए प्रतिबद्ध मतदाता किसी दूसरे दल को वोट न दें, लेकिन नाराजगी दिखाने के लिए वह मतदान के दिन घर पर ही रुका रह सकता है। इन हालात में भाजपा के लिये सीटों को बचाये रखना कड़ी मशक्कत का काम हो सकता है।

हाल ही में जिले के विभिन्न क्षेत्रों में निकाली गई जनविश्वास यात्रा को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में भले ही उत्साह रहा हो, लेकिन भाजपा इस यात्रा से आम जनमानस को जोड़ने में अधिक सफल नहीं हो सकी। पार्टी के शीर्ष नेताओं द्वारा भले ही प्रदेश के विकास के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की जा रहीं हैं, लेकिन आगरा के लिए अभी तक ऐसी कोई बड़ी घोषणा नहीं हो पाई है जो मतदाताओं को रिझा सके। विधानसभा चुनावों में पूरी तरह स्थानीय मुद्दे हावी दिखाई दे रहे हैं। इन सभी हालात में पार्टी के समक्ष जनप्रिय उम्मीदवार का चुनाव करना बड़ी चुनौती है।

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