आगरा जिले की सभी नौ सीटों का रहा है रोचक इतिहास
खेरागढ़:
इस सीट की सबसे दिलचस्प कहानी है कि क्षेत्र के करीब 40 गांव पार्टियों की जीत तय करते हैं। यहां पड़ने वाले ब्लॉक सैयां को त्यागी चालीसी के नाम से भी जाना जाता है। इस ब्लॉक में त्यागी समाज के चालीस गांव हैं। कहा जाता है कि इन 40 गांवों का 'आशीर्वाद' जिस उम्मीदवार को मिल जाए उसकी जीत तय है।
इस सीट से वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के महेश गोयल ने जीत दर्ज की थी। कांग्रेस इस सीट से आठ बार जीती है, जबकि भाजपा तीन और बसपा दो बार चुनाव जीत चुकी है। समाजवादी पार्टी का अभी तक यहां खाता नहीं खुला है। इस विधानसभा क्षेत्र में क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, कुशवाहा, जाटव और जाट किंगमेकर की भूमिका में हैं। इनके अलावा मुस्लिम, गुर्जर भी अच्छी तादाद में हैं।
फतेहाबाद:
इस सीट के मतदाता कभी भी किसी एक पार्टी में बंधकर नहीं रहते हैं। इस क्षेत्र में राष्ट्रीय मुद्दों से ज्यादा जातीय समीकरण हावी रहते हैं। यह ठाकुर और निषाद बाहुल्य क्षेत्र है। कस्बों में वैश्य वर्ग की जनसंख्या ज्यादा है। यही तीन वर्ग इस सीट की किस्मत तय करते हैं। इस सीट का इतिहास रहा है कि किसी राजनीतिक दल के प्रत्याशी की यहां हैट्रिक नहीं हुई। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी जितेंद्र वर्मा विजयी रहे थे।
फतेहपुर सीकरी:
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से भाजपा के चौधरी उदयभान सिंह चुनाव जीतकर विधायक बने थे। उन्होंने बसपा के सूरज पाल सिंह को हराया था। इस बार के चुनावों में जनता उदयभान सिंह से बहुत खुश नजर नहीं आ रही है।
इस कारण सभी दलों की निगाहें इस सीट को जीतने पर टिकी होंगी।वैसे इस सीट से वर्ष 1977 के बाद से वर्ष 2002 तक जाट उम्मीदवारों को ही जीत मिली है। इस सीट पर जाट, ब्राह्मण, जाटव, ठाकुर, मुस्लिम, यादव और लोधी राजपूत किंगमेकर की भूमिका में हैं।
आगरा छावनी:
विधानसभा चुनाव 2017 में भाजपा के डॉ. जी.एस. धर्मेश जीते थे। धर्मेश ने तीन बार से लगातार जीत रही बसपा का विजय-रथ रोक दिया था। उन्होंने बसपा के गुटियारी लाल दुबेश को हराया था। इस सीट पर जाटव, वाल्मीकि समाज, ब्राह्मण, राठौर और मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में होते हैं। सिंधी और पंजाबी वोटरों की संख्या भी करीब तीस हजार है।
इस सीट पर वर्ष 1967 से 1985 तक कांग्रेस जीतती रही। वर्ष 1989 से 1996 तक भाजपा का वर्चस्व रहा। वर्ष 2002 में बसपा के खाते में यह सीट चली गई। बसपा यहां से लगातार तीन बार जीती, मगर 2017 में यह सीट पुनः भाजपा के खाते में पहुंच गई। सपा को यहां खाता खुलने का इंतजार है।
आगरा उत्तर:
करीब 36 सालों से भाजपा के कब्जे में रहने वाली इस सीट को इस बार भी पार्टी के लिए सबसे सुरक्षित माना जा रहा है। भाजपा के जगन प्रसाद गर्ग इस सीट से पांच बार और उनसे पूर्व सत्यप्रकाश विकल चार बार चुनकर विधानसभा पहुंचे थे।
इसीलिए इस सीट पर भाजपा के सर्वाधिक दावेदार नजर आ रहे हैं। इस सीट पर वैश्य वोटरों का हमेशा बोलबाला रहा है। टिकट के दावेदारों में भी उनकी बहुलता है। इस सीट पर कुल सवा चार लाख वोटर हैं, जिनमें से करीब दो लाख वैश्य वोटर हैं।
वर्ष 2017 में इस सीट से पांचवीं बार चुने गए भाजपा के जगन प्रसाद गर्ग के असामयिक निधन के बाद वर्ष 2019 में उप चुनाव कराए गए थे। तब भाजपा के पुरुषोत्तम खण्डेलवाल सपा के प्रत्याशी को करीब साठ हजार मतों से हराकर विधायक बने थे। पुरुषोत्तम भले ही पार्टी के अच्छे कार्यकर्ता रहे लेकिन विधायक के रूप में जनता का दिल ज्यादा नहीं जीत सके हैं। जोंस मिल के विवादित प्रकरण में नाम आने के बाद उनके खिलाफ विरोध के स्वर भी उठे हैं। इसी के मद्देनजर कई वैश्य उम्मीदवारों ने भाजपा से टिकट पाने के लिए आजमाइश तेज कर दी है। हालांकि पुरुषोत्तम खण्डेलवाल भी पूरा कार्यकाल न मिल पाने के तर्क के साथ पुनः टिकट के सशक्त दावेदार हैं।
गौरतलब है कि आगरा उत्तर सीट पहले आगरा पूर्व के नाम से जानी जाती थी। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट का परिसीमन बदल गया। यह सीट वर्ष 1952 से कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही थी, लेकिन वर्ष 1989 से यह भाजपा की मुठ्ठी में आ गई।
बाह:
इस विधानसभा सीट पर हमेशा से ही भदावर राजघराने का प्रभाव देखा गया है। वर्ष 1952 से अब तक हुए 17 विधानसभा चुनावों में 11 बार विधायक इसी परिवार से कोई चुना गया है। वर्ष 2017 में भाजपा से पक्षालिका सिंह ने बसपा के मधुसूदन शर्मा को 23,140 वोटों से हराया था।
इस सीट पर पहली बार चुनाव वर्ष 1952 में हुए थे जिसमें कांग्रेस के शंभुनाथ चतुर्वेदी की जीत हुई थी। वर्ष 1957 में निर्दलीय प्रत्याशी और भदावर राजघराने के महेंद्र रिपुदमन सिंह इस सीट से जीते। इसके बाद वह वर्ष 1974 के चुनाव में स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े और विधानसभा पहुंचे। महेंद्र रिपुदमन सिंह इस सीट से चार बार चुनाव जीते। महेंद्र रिपुदमन सिंह के बाद उनके बेटे महेंद्र अरिदमन सिंह ने पिता की विरासत संभाली। वर्ष 1989 में पहली बार विधायक चुने गए अरिदमन सिंह लगातार पांच बार इस सीट से चुनाव जीते। वर्ष 1989, 1991 और 1993 में जनता पार्टी से, तो वर्ष 1996 और 2002 में वे भाजपा के टिकट पर जीते। वर्ष 2007 में यहां से बसपा के मधुसूदन शर्मा जीत गए, मगर वर्ष 2012 के चुनाव में सपा के टिकट पर लड़े अरिदमन सिंह की वापसी हुई। वर्ष 2017 के चुनाव से पहले वह भाजपा में आ गए और पार्टी ने उनकी पत्नी पक्षालिका सिंह को टिकट दिया।
एत्मादपुर:
भाजपा को वर्ष 2017 में पहली बार यहां से जीत का स्वाद चखने को मिला। रामप्रताप सिंह चौहान ने 47 हजार से ज्यादा मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
इस सीट का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प रहा है। यहां कभी एक पार्टी का प्रभुत्व नहीं रहा। भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, कांग्रेस (इ), लोकदल, जनता दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल जैसी अलग-अलग पार्टियां जीत दर्ज करती आई हैं। वर्ष 2017 में बसपा जीत की हैट्रिक का सपना संजोए बैठी थी। क्षेत्र में कराए कार्यों और जातीय समीकरणों से तत्कालीन विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह के जीतने की सम्भावना प्रबल मानी जा रही थी, मगर अंत में बाजी भाजपा के हाथ लगी।
आगरा ग्रामीण (सुरक्षित) :
इस सीट से वर्ष 2017 में भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी। भाजपा की हेमलता दिवाकर ने बहुजन समाज पार्टी के कालीचरण सुमन को 65, 296 वोटों से हराया था।
आगरा ग्रामीण (पहले दयालबाग) सीट उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जिन पर कांग्रेस पार्टी को आज तक जीत नसीब नहीं हुई। वर्ष 1974 से ही यहां गैर-कांग्रेसी दल जीतते आ रहे हैं। एक समय इस सीट को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का गढ़ माना जाता था। लेकिन परिसीमन बदलने के बाद जातीय आंकड़ों में भी बदलाव हुआ है।
वर्तमान विधायक हेमलता को लेकर मतदाताओं में बड़ी नाराजगी दिखाई दे रही है। उन पर क्षेत्रीय समस्याओं के प्रति घोर उदासीनता बरतने के आरोप हैं। कुछ इलाकों में तो उनके लापता होने के पोस्टर तक लग चुके हैं। हालांकि हेमलता इसे विरोधियों की साजिश बताती हैं, तथापि इस क्षेत्र में जनता के मूड को ध्यान में रखना भाजपा के लिए बड़ी मेहनत का काम होगा। वहीं दूसरे दल जनता की नाराजगी को अपने पक्ष में भुनाने के पूरे प्रयास करने में लगे हैं।
आगरा दक्षिण:
यहाँ पिछले दस साल से भाजपा का कब्जा है। यह विधानसभा सीट वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी। परिसीमन से पहले यह सीट आगरा छावनी सीट का हिस्सा थी। भाजपा के योगेंद्र उपाध्याय ने वर्ष 2012 में पहली बार जीत दर्ज की थी। वर्ष 2017 के चुनावों में भी वह विजयी रहे और इस बार उनकी निगाहें हैट्रिक पर हैं। योगेंद्र उपाध्याय का वर्तमान कार्यकाल कुछेक विवादों से भी घिरा रहा है। यही कारण है कि कुछ पार्टीजन यहां प्रत्याशी बदले जाने की भी मांग करने लगे हैं। वहीं इस सीट पर स्वयं को पहले से बेहतर स्थिति में मान रही बसपा ने महीनों पहले ही रवि भारद्वाज को उम्मीदवार भी घोषित कर दिया है। बसपा ने यदि अंत समय में कोई फेरबदल नहीं किया तो वे ही उम्मीदवार बने रहेंगे। बसपा ने पिछले दो बार के चुनावों में जुल्फिकार अहमद भुट्टो को अपना प्रत्याशी बनाया था।
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